बाजार, नागरिक समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। बाजार का उद्भव का कारण ही यह है कि मनुष्य व्यक्तिगत रूप से किए जाने वाले कार्य की तुलना में अन्य लोगों के सहयोग से ज्यादा हासिल कर सकता है और इसका अनुभव भी किया जा सकता है। यदि हम ऐसे प्राणी होते जिसके लिए व्यक्तिगत रूप से किए जाने वाले कार्यों की तुलना में सहकारिता के तहत किया जाने वाला कार्य ज्यादा उत्पादक नहीं होता, या फिर हम सहकारिता के लाभों को समझ पाने में असमर्थ होते तो हम अवश्य ही अलग थलग व एकाकी रहते। लेकिन इससे भी बुरा यह है जैसा कि लुडविंग वॉन माइसेस व्याख्या करते हैं, ‘प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति को दुश्मन के तौर पर देखने के लिए मजबूर किया गया होगा, अपनी स्वयं की भूख को संतुष्ट करने की उसकी तृष्णा ने उसे अपने पड़ोसियों के साथ संगदिल संघर्ष के लिए मजबूर किया होगा।’ सहकारिता और श्रम के विभाजन के द्वारा परस्पर लाभ की संभावना के बगैर न तो सहानुभूति की भावना व दोस्ती और ना ही स्वयं बाजार व्यवस्था का उदय हो सकता है। संपूर्ण बाजार प्रक्रिया के दौरान व्यक्ति और संस्थाएं बेहतर सहयोग प्रदान करने के लिए परस्पर प्रतिस्पर्धा करती रहती हैं। जनरल मोटर्स और टोयोटा जैसी कंपनियां परिवहन के मेरे लक्ष्य को प्राप्त करने में मुझे सहयोग करने के लिए परस्पर व दूसरों से प्रतिस्पर्धा करती हैं। एटी एंड टी और एमसीआई जैसी कंपनियां संचार के मेरे लक्ष्य को प्राप्त करने में मुझे सहयोग करने के लिए परस्पर व दूसरों से प्रतिस्पर्धा करती हैं कि संचार के क्षेत्र की किसी अन्य कंपनी द्वारा मुझे स्वचलित जवाब देने वाला फोन प्रदान कर मानसिक शांति और सकून दोनों प्रदान कर दिया गया। बाजार के आलोचक प्रायः यह शिकायत करते हैं कि पूंजीवाद लोगों को स्वार्थ के प्रति प्रोत्साहित करता है और उन्हें इसके लिए सम्मानित करता है। वास्तविकता यह है कि लोग सभी राजनैतिक प्रणालियों के तहत स्वार्थी होते हैं। बाजार तो बस उनके स्वार्थ को सामाजिक लाभ की दिशा में मोड़ता है। और लोग एक मुक्त बाजार में अपने उद्देश्यों को पूरा कर पाते हैं यह देखते हुए कि कौन उसके लिए ऐसा करना चाहता है और वह बदले में उसे क्या प्रदान कर सकता है? यह कई लोगों के लिए मछली पकड़ने का जाल अथवा सड़क के निर्माण के लिए एक साथ काम करने का माध्यम हो सकता है। और अधिक जटिल अर्थव्यवस्था में इसका तात्पर्य, एक व्यक्ति द्वारा स्वयं के हित को देखते हुए दूसरों को अपनी वस्तु अथवा सेवाएं, जो उसे संतुष्टि प्रदान कर सकती है, प्रदान करना है। वे कर्मचारी और उद्यमी; जो कि अपनी आवश्यकताओं को सर्वश्रेष्ठ तरीके से पूरा कर सकते हैं, पुरस्कृत किए जाएंगे। जो ऐसा नहीं कर पाते, वे भी जल्द ही ऐसा तरीका ढूंढ लेंगे व अपने से ज्यादा सफल प्रतिस्पर्धी का अनुसरण करने को प्रोत्साहित होते हैं या कुछ नया तरीका ढूंढ लेते हैं। बाजार में दिखने वाली वे सभी भिन्न भिन्न प्रकार की आर्थिक संस्थाएं परस्पर उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सहयोग करने के बेहतर तरीके ढूंढने के लिए प्रयोग करती रहती हैं। संपत्ति के अधिकार, न्याय के शासन और कम से कम सरकारी हस्तक्षेप वाली प्रणाली अधिक से अधिक लोगों को सहकारिता के नए नए तरीके ढूंढने के लिए प्रयोग करने की अनुमति देती है। सहयोग की भावना में वृद्धि से उन बड़ी आर्थिक क्रियाओं को भी करने का प्रोत्साहन प्राप्त होता है जिन्हें व्यक्तिगत तौर पर अथवा साझेदारी में कर पाना संभव नहीं होता। सम्मिलित अधिकार वाली संस्थाओं, म्यूचुअल फंड्स, बीमा कंपनियों, बैंकों, कर्मचारियों के स्वामित्व वाली संस्थाएं आदि जैसे तमाम संगठन दरअसल, संगठनों के नए स्वरूप में आर्थिक समस्या विशेष का समाधान करने वाले प्रयास ही हैं। ऐसे स्वरूपों में से कुछ अपर्याप्त भी साबित होते हैं। उदाहरण के लिए 1960 के दशक की कई कॉर्पोरेट कंपनियों के संगठन अप्रबंधन योग्य साबित हुए और उनमें हिस्सेदारी रखने वाले (शेयर होल्डर्स) लोगों के धन डूब गए। बाजार प्रक्रिया की तीव्र गति से फैलने वाली प्रतिपुष्टि संगठनों के सफल स्वरूप के अनुसरण को प्रोत्साहन प्रदान करती है और असफल स्वरूपों को हतोत्साहित करती है। पूंजीवादी व्यवस्था में सहकारिता का भी उतना ही स्थान है जितना की प्रतिस्पर्धा का। नैसर्गिक स्वतंत्रता की साधारण प्रणाली के लए दोनों आवश्यक तत्व हैं। हम में से अधिकांश लोग प्रतिस्पर्धा की तुलना में अपना अधिकतर समय अपने साझेदारों, सहयोगियों, आपूर्तिकर्ताओं और उपभोक्ताओं के साथ सहयोग करने में व्यतीत करते हैं। दरअसल, जीवन यदि निर्जन हो जाए तो यह अत्यंत बुरा, पाश्विक और छोटा हो जाएगा। भाग्यवश, हम सबके लिए पूंजीवादी समाज ऐसा नहीं है। |
पूंजीवाद की नैतिकताः